ईरान-अमेरिका सीज़फायर में 10 शर्तें तय, अब नजर अमल और भरोसे पर

नई दिल्ली: 39 दिनों के भीषण टकराव के बाद धमाकों की खामोशी. इन उनतालीस दिनों मे चैनलों और अख़बारों की सुर्खियों में तानाशाही खत्म कर लोकतंत्र बहाल करने के दावे शामिल रहे. मीडिया की सुर्खियों में ईरान को कोसते नज़र आये इज़रायल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद ईरान को घेरने की तैयारियां थीं. बयानबाज़ी, मेज पर दोस्ताना व्यवहार और आपसी सहमति सबकुठ ठीक चल रहा था लेकिन अचानक ईरान पर हमला हुआ और मीडिया संस्थान और अख़बारों के पन्ने इस टकराव से भर गए. यह ठीक वैसा ही था जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध में लगा कि यूक्रेन एक हफ्ते से ज्यादा रूस के सामने नहीं टिक पाएगा लेकिन आज भी टकराव जारी है, ठीक वैसे ही लगा कि इज़रायल और अमेरिका के आगे ईरान की भला क्या बिसात? एक हफ्ते में ईरान घुटनों पर आ जाएगा लेकिन हुआ इसके ठीक उलट. ईरान ने ऐसी रणनीति अपनाई की दुनियाभर के मीडिया संस्थानों और विशेषज्ञों के वक्त के साथ सुर बदलते चले गए.
अमेरिका ने खामनेई को खत्म कर यह मान लिया कि अब ईरान घुटनों पर आ जाएगा, लीडर खत्म सत्ता खत्म लेकिन हुआ इसका ठीक उलट. ईरान लड़ाकों का देश कहा जाता है और उसने वह कर दिखाया जिसका खुद अमेरिका को अंदाज़ा नहीं. हालत यह हो गई कि अमेरिका को मध्यस्थता करने के लिए माध्यम बनने वाला कोई देश ही नहीं मिल रहा था. अब यह बागडोर अपने हाथ में उस देश ने ली जिसके ऊपर आतंक को पनाह देने का दाग है, जिस देश में आतंक की बेल आज भी पनपती है और अंडरवर्ड सरगना दाऊद और लादेन जैसे खूंखार आतंकियों को जिसने पनाह दी जो कि जगजाहिर है. अब सवाल यह है कि ईरान-इजराय-अमेरिका के बीच इस टकराव को रोकने के लिए मध्यस्थना करने वाले देश पर क्या ईरान भरोसा करेगा? और अगर करता है तो यह भरोसा कितने दिनों तक कायम रह पाएगा, फिलहाल कहना मुश्किल है. फिलहाल ईरान ने 10 शर्तों के साथ अमेरिका के साथ चल रहे टकराव को विराम देने का प्रस्ताव मान लिया है. आइये जानते हैं कि 10 शर्तें कौन सी हैं?
संभावित 10 प्रमुख शर्तें
- समुद्री मार्गों (खासतौर पर खाड़ी क्षेत्र) की सुरक्षा सुनिश्चित करना
- ड्रोन और मिसाइल हमलों पर रोक
- क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों में कमी
- दोनों देशों के बीच कैदियों की अदला-बदली
- ईरान पर लगे कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में आंशिक ढील
- परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी
- क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों/गुटों पर नियंत्रण बनाए रखना
- खुफिया और साइबर गतिविधियों में संयम
- वैश्विक बाजार को देखते हुए तेल आपूर्ति में स्थिरता
- कूटनीतिक वार्ता और बैक-चैनल बातचीत जारी रखना
ईरान और अमेरिका के बीच हालिया तनाव के बाद सामने आए युद्ध विराम (सीज़फायर) के संकेत वैश्विक राजनीति के लिए एक राहत भरा क्षण जरूर हैं, लेकिन इसे स्थायी शांति की दिशा में निर्णायक कदम मानना अभी जल्दबाज़ी होगी। ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे अविश्वास, प्रतिबंधों और सामरिक प्रतिस्पर्धा ने क्षेत्र को बार-बार अस्थिर किया है। मौजूदा विराम अधिकतर रणनीतिक दबाव, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और संभावित बड़े संघर्ष से बचने की मजबूरी का परिणाम प्रतीत होता है।
ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बनी इस अस्थायी सहमति को सूत्रों के अनुसार कई शर्तों के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है। इन शर्तों के बावजूद स्थिति पूरी तरह स्थिर नहीं कही जा सकती, क्योंकि दोनों देशों के बीच वर्षों पुराना अविश्वास अब भी कायम है। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा में है, जो एक तरफ अमेरिका का रणनीतिक साझेदार रहा है तो दूसरी ओर क्षेत्रीय इस्लामिक देशों के साथ अपने संबंधों के कारण संतुलन बनाने की कोशिश करता दिखता है। पाकिस्तान संभावित रूप से मध्यस्थ या बैक-चैनल संवाद का हिस्सा बन सकता है, लेकिन उसकी अपनी आंतरिक और क्षेत्रीय चुनौतियां उसकी प्रभावशीलता को सीमित कर सकती हैं। कुल मिलाकर यह युद्ध विराम एक नाजुक संतुलन है—जहां शर्तों का पालन और क्षेत्रीय खिलाड़ियों की भूमिका ही तय करेगी कि यह शांति टिकाऊ साबित होगी या सिर्फ एक अस्थायी विराम।
पाकिस्तान ने मध्यस्थता कर भले ही टकराव पर कुछ समय के लिए विराम लगवा दिया है लेकिन हालात इतने आसान भी नज़र नहीं आ रहे क्योंकि ईरान-अमेरिका के विराम के बाद ही नेतन्याहू के कार्यालय से लेबनान पर हो रहे हमले को लेकर आये एक बयान ने स्थिति को पेचीदा बना दिया है. जहां ईरान और पाकिस्तान की ओर से कहा जा रहा है कि यह समझौता लेबनान पर भी लागू होता है वहीं प्रधानमंत्री बेंन्यामिन नेतन्याहू के कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है कि यह युद्ध विराम लेबनान को शामिल नहीं करता है. गौरतलब है कि लेबनान में इज़रायल, ईरान समर्थित संगठन हिज्बुल्लाह के खिलाफ लड़ रहा है.
हाल के हफ्तों में इज़रायल ने दक्षिण लेबनान में अपनी थल सेना को भेजा है. इजरायल ने लेबनान में हिज्बुल्लाह के कब्ज़े वाले इलाकों पर बड़े हमले किए हैं. उसका कहना है कि हिज्बुल्लाह के हटने तक वह अपनी फौज़ को वहां से नहीं हटाएगा.
ईरान और अमेरिका के बीच हालिया युद्ध विराम के संकेत भले ही राहत देने वाले हों, लेकिन ऐसा तो नहीं वर्तमान शांति आने वाले तूफान का संकेत हो. फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि यह युद्ध विराम शर्तों पर टिका एक नाजुक संतुलन है, जिसकी सफलता 10 बिंदुओं को लेकर आपसी समझ और गंभीरता पूर्वक उनका पालन करने पर टिकी है.