शिक्षक नहीं, किताबें नहीं… फिर कैसे लागू होगी CBSE तीन-भाषा नीति?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। CBSE तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर जल्द सुनवाई की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन कई स्कूलों में न तो पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही आवश्यक अध्ययन सामग्री। ऐसे में छात्रों और अभिभावकों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
CBSE तीन-भाषा नीति पर जल्द सुनवाई की मांग
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में CBSE तीन-भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं का उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल संकरनारायणन ने अदालत से अनुरोध किया कि मामले की सुनवाई बुधवार या गुरुवार को की जाए।
उन्होंने दलील दी कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है और नीति के क्रियान्वयन से जुड़े कई व्यावहारिक प्रश्न अभी भी अनसुलझे हैं। छात्रों को पढ़ाई के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठाए गए।
किताबों और शिक्षकों की कमी का हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि CBSE तीन-भाषा नीति को लागू करने के लिए पर्याप्त शिक्षक और अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं है। उनके अनुसार, कई स्कूलों को अभी तक आवश्यक पुस्तकों और प्रशिक्षित शिक्षकों की व्यवस्था करने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष यह मुद्दा उठाया गया। पीठ का नेतृत्व कर रहे चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालत इस अनुरोध पर विचार करेगी।
इससे पहले शीर्ष अदालत ने नीति के खिलाफ दायर याचिकाओं पर केंद्र सरकार, एनसीईआरटी और सीबीएसई से जवाब मांगा था।
केंद्र, CBSE और NCERT ने किया बचाव
मामले में केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी ने अपने-अपने हलफनामों में CBSE तीन-भाषा नीति का समर्थन किया है। प्राधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत तैयार किया गया तीन-भाषा ढांचा बहुभाषावाद और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया है।
उनका तर्क है कि देशभर के संबद्ध स्कूलों में इस व्यवस्था को लागू करना शिक्षा सुधारों का हिस्सा है। इसलिए इस नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने क्या उठाए सवाल?
दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अन्य वकीलों ने कहा कि CBSE तीन-भाषा नीति छात्रों पर भाषाओं का चयन थोपने जैसी स्थिति पैदा करती है।

उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि सीबीएसई का सर्कुलर बिना पर्याप्त विकल्प दिए भाषा चयन की व्यवस्था लागू कर रहा है, जो शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) के कुछ प्रावधानों के विपरीत माना जा सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट पहले ही एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को नीति की व्यावहारिक और लॉजिस्टिक तैयारियों पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दे चुका है।
1 जुलाई 2026 से लागू होने वाले नियम में क्या है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन (NCF-SE) 2023 के तहत जारी सर्कुलर के अनुसार 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होगा।
नियम के तहत तीन भाषाओं में कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना आवश्यक है। छात्र विदेशी भाषा का चयन तभी कर सकता है, जब वह दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन कर चुका हो या फिर विदेशी भाषा को चौथे वैकल्पिक विषय के रूप में चुना जाए।
सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि स्थानीय और राज्य स्तरीय साहित्यिक कृतियों को पूरक अध्ययन सामग्री के रूप में शामिल किया जाएगा, ताकि भाषा शिक्षण को अधिक समृद्ध बनाया जा सके।

आगे क्या होगा?
फिलहाल CBSE तीन-भाषा नीति पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह है कि नीति के क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं या नहीं, और क्या इसे लागू करने की प्रक्रिया छात्रों के हितों के अनुरूप है। अदालत की आगामी सुनवाई पर अब छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों की नजरें टिकी हुई हैं। (Amar Bharti)
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