BRICS Summit 2026: ट्रंप को क्यों सता रहा डर? डॉलर से लेकर ग्लोबल पावर तक समझिए पूरी कहानी

BRICS Summit 2026 पर अमेरिका की नजर क्यों है? ट्रंप की 100% टैरिफ धमकी, डॉलर, NDB, रूस-चीन-ईरान और भारत की कूटनीतिक चुनौती को समझिए।

BRICS Summit 2026 Trump Modi Dollar
BRICS Summit 2026 में भारत की मेजबानी पर अमेरिका समेत पूरी दुनिया की नजर।

नई दिल्ली/अमर भारती। दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाले BRICS Summit 2026 पर पूरी दुनिया की नजर है। लेकिन इस सम्मेलन को लेकर सबसे ज्यादा दिलचस्पी अमेरिका की भी है। वजह है BRICS का लगातार बढ़ता दायरा, डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश और भारत की मेजबानी में रूस, चीन और ईरान जैसे देशों का एक मंच पर आना।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही BRICS को लेकर कई बार नाराजगी जता चुके हैं। वह BRICS देशों द्वारा डॉलर की जगह किसी दूसरे विकल्प को बढ़ावा देने की स्थिति में 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दे चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि BRICS से डोनाल्ड ट्रंप को आखिर क्या खतरा दिखता है? और भारत में होने वाले इस सम्मेलन का अमेरिका पर क्या असर पड़ सकता है?

BRICS पर ट्रंप की नजर क्यों?

दिल्ली में BRICS का बड़ा महामंच सजने जा रहा है। भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। यही वजह है कि वॉशिंगटन की नजर भी दिल्ली पर टिकी है। BRICS अब सिर्फ ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं है। समूह के विस्तार के बाद इसमें ईरान, मिस्र, इथियोपिया, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देश भी शामिल हैं।

इस विस्तार के साथ BRICS का आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ा है। समूह के भीतर कई देश वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अधिक विविधता की वकालत कर रहे हैं। इसमें अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करना शामिल है। हालांकि भारत का रुख काफी स्पष्ट है। नई दिल्ली BRICS को किसी एंटी-अमेरिका या एंटी-वेस्ट गठजोड़ के बजाय ग्लोबल साउथ की आवाज और व्यावहारिक आर्थिक सहयोग के मंच के तौर पर देखता है।

ट्रंप की BRICS से नाराजगी और 100% टैरिफ की धमकी

डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से BRICS के संभावित डी-डॉलराइजेशन एजेंडे पर सवाल उठाते रहे हैं। नवंबर 2024 में उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर BRICS देश डॉलर को कमजोर करने के लिए कोई नई करेंसी या विकल्प तैयार करते हैं, तो अमेरिका 100 फीसदी टैरिफ लगा सकता है।

जनवरी 2025 में भी ट्रंप ने इस चेतावनी को दोहराया। फरवरी 2025 में उन्होंने BRICS देशों को डॉलर के साथ कथित तौर पर “खेलने” की कोशिश के खिलाफ फिर 100 फीसदी टैरिफ की बात कही। इसके बाद जुलाई 2025 में ट्रंप ने BRICS की कथित एंटी-अमेरिकन नीतियों के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 फीसदी टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दी। यानी ट्रंप के लिए BRICS का मुद्दा सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। इसके पीछे अमेरिकी आर्थिक ताकत और डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व का सवाल भी जुड़ा हुआ है।

क्या BRICS डॉलर को खत्म करने की तैयारी में है?

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। BRICS के पास फिलहाल कोई साझा करेंसी नहीं है और भारत ने भी डॉलर को हटाने वाली किसी साझा BRICS करेंसी की वकालत नहीं की है।

भारत का जोर अधिक व्यावहारिक विकल्पों पर रहा है। इनमें द्विपक्षीय व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल, भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी और सीमा-पार लेनदेन को आसान बनाना शामिल है। रूस का रुख भी इसी बहस को जटिल बनाता है। क्रेमलिन की ओर से कई मौकों पर यह स्पष्ट किया गया है कि रूस का उद्देश्य डॉलर को तत्काल खत्म करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए ज्यादा विकल्प उपलब्ध कराना है। इसलिए BRICS में डॉलर को तुरंत हटाने की कोई एकजुट योजना नहीं है। लेकिन स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश जरूर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में धीरे-धीरे बदलाव ला सकती है।

डॉलर को BRICS से खतरा क्यों माना जा रहा है?

आज भी अमेरिकी डॉलर वैश्विक व्यापार और विदेशी मुद्रा भंडार की सबसे प्रमुख करेंसी है। लेकिन BRICS के बढ़ते आर्थिक वजन के साथ इसकी भूमिका पर बहस तेज हुई है। BRICS के कुछ सदस्य अमेरिकी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने की उनकी दिलचस्पी स्वाभाविक रूप से बढ़ी है।

अगर स्थानीय मुद्रा में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान तंत्र और डिजिटल वित्तीय कनेक्टिविटी बड़े स्तर पर मजबूत होते हैं, तो लंबे समय में वैश्विक वित्तीय प्रणाली में डॉलर की केंद्रीय भूमिका पर कुछ दबाव जरूर बन सकता है। हालांकि इसे डॉलर के तत्काल अंत के रूप में देखना सही नहीं होगा।

BRICS में ईरान की मौजूदगी क्यों अहम?

दिल्ली सम्मेलन में ईरान की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। ईरान BRICS का सदस्य है और लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। ऐसे में ईरान की BRICS में मौजूदगी समूह के बदलते भू-राजनीतिक स्वरूप को दिखाती है। रूस, चीन और ईरान जैसे देशों का एक ही बहुपक्षीय मंच पर होना वॉशिंगटन के लिए निश्चित तौर पर रणनीतिक महत्व रखता है। भारत के लिए चुनौती और बड़ी है। उसे BRICS के भीतर रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के साथ सहयोग करना है, लेकिन साथ ही अमेरिका के साथ अपने महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक संबंधों का संतुलन भी बनाए रखना है।

BRICS बैंक: क्या बन सकता है वित्तीय विकल्प?

BRICS की ताकत केवल नेताओं की बैठकों तक सीमित नहीं है। इसकी संस्थागत संरचना भी लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। इनमें New Development Bank यानी BRICS Bank प्रमुख है। न्यू डेवलपमेंट बैंक का उद्देश्य विकासशील देशों के बुनियादी ढांचे और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है। इसके जरिए BRICS देशों और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए पारंपरिक वित्तीय संस्थानों के अलावा एक अतिरिक्त विकल्प तैयार हुआ है।

भारत के लिए NDB क्यों अहम है?

भारत में न्यू डेवलपमेंट बैंक कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दे चुका है। मार्च 2026 तक भारत में NDB की मंजूर परियोजनाओं का कुल मूल्य करीब 9.5 अरब डॉलर बताया गया है। इन परियोजनाओं में मेट्रो और RRTS, सड़क एवं पुल, जल एवं स्वच्छता, स्वच्छ ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ RRTS के लिए 500 मिलियन डॉलर की सहायता, असम के दो ब्रिज प्रोजेक्ट्स के लिए 633.8 मिलियन डॉलर और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए 300 मिलियन डॉलर की फंडिंग इसके प्रमुख उदाहरणों में शामिल हैं। यानी BRICS Bank भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था नहीं है, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर और सतत विकास के लिए लंबी अवधि के वित्त का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है।

क्या BRICS अमेरिकी आर्थिक दबदबा कम कर सकता है?

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि BRICS डॉलर को बदल रहा है। लेकिन स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान प्रणाली और NDB जैसी संस्थाओं को मजबूत करने की कोशिश वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विविधता जरूर ला सकती है।

यही वह पहलू है जिस पर अमेरिका की नजर सबसे ज्यादा है। BRICS जितना बड़ा और आर्थिक रूप से प्रभावशाली होता जाएगा, उतना ही वैश्विक आर्थिक फैसलों में ग्लोबल साउथ की भूमिका बढ़ सकती है। इससे अमेरिका के पारंपरिक आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव को कुछ क्षेत्रों में चुनौती मिल सकती है।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती

दिल्ली में होने वाला BRICS Summit 2026 भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं, बल्कि बड़ा कूटनीतिक टेस्ट भी है। भारत को एक तरफ BRICS को मजबूत करना है और ग्लोबल साउथ की आवाज को आगे बढ़ाना है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना है कि BRICS को किसी एंटी-अमेरिकन या एंटी-वेस्ट मंच के तौर पर पेश न किया जाए।

रूस, चीन, ईरान और अन्य सदस्य देशों के अलग-अलग रणनीतिक हितों के बीच भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों का संतुलन बनाए रखना होगा। दिल्ली से BRICS सम्मेलन के दौरान निकलने वाला संदेश सिर्फ सदस्य देशों के लिए महत्वपूर्ण नहीं होगा। वॉशिंगटन भी यह देखेगा कि भारत की मेजबानी में BRICS आर्थिक सहयोग का मंच बनता है या वैश्विक शक्ति संतुलन में एक नए ध्रुव के तौर पर उभरता है। (amar bharti)

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