परिसीमन विधेयक पर BJP की रणनीति, क्या विपक्षी एकता में लगेगी सेंध?

परिसीमन विधेयक: खरगे ने पीएम मोदी को लिखा चौथा पत्र, रिजिजू की प्रतिक्रिया

परिसीमन विधेयक पर भाजपा की रणनीति और विपक्षी एकता से जुड़ी राजनीतिक बहस
परिसीमन विधेयक पर सरकार और विपक्ष के बीच सहमति को लेकर राजनीतिक बहस तेज।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस को आशंका है कि भाजपा इस विधेयक पर क्षेत्रीय दलों से अलग-अलग बातचीत कर विपक्षी खेमे में मतभेद पैदा करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या परिसीमन के मुद्दे पर विपक्षी दलों की एकजुटता कमजोर पड़ सकती है और इसका असर SIR के खिलाफ बने संयुक्त मोर्चे पर भी दिखाई देगा।

परिसीमन विधेयक पर फिर चर्चा, संसद के संक्षिप्त सत्र की अटकलें

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बयान के बाद परिसीमन विधेयक पर संसद का संक्षिप्त सत्र बुलाए जाने की अटकलों को फिर हवा मिली है। हालांकि, इस संबंध में किसी सत्र की तारीख की पुष्टि मूल सामग्री में नहीं की गई है।

कांग्रेस को आशंका है कि सरकार विधेयक को दोबारा पारित कराने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। इसी बीच, सरकार की ओर से कई क्षेत्रीय दलों के साथ बातचीत किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस घटनाक्रम ने विपक्षी दलों के बीच संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा सका था विधेयक

इस साल अप्रैल में सरकार ने महिला आरक्षण और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में पारित कराने की कोशिश की थी। हालांकि, विधेयक को जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका।

मतदान के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। कुल 528 सदस्यों ने मतदान किया था, जबकि विधेयक पारित कराने के लिए कम से कम 352 मतों की जरूरत थी।

प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य 2029 से विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना बताया गया है। आवश्यक समर्थन नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो पाया था।

कांग्रेस को क्यों है विपक्षी दलों में सेंध लगने का डर?

कांग्रेस को आशंका है कि सरकार विधेयक के समर्थन में दो-तिहाई बहुमत जुटाने के लिए विपक्षी दलों से अलग-अलग बातचीत कर रही है। पार्टी की चिंता यह है कि यदि कुछ क्षेत्रीय दल सरकार के प्रस्ताव के समर्थन में आते हैं, तो विपक्षी एकता पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, सरकार की ओर से क्षेत्रीय दलों के साथ बातचीत को व्यापक सहमति बनाने की कोशिश बताया गया है। इसलिए इस प्रक्रिया को विपक्षी गठबंधन में सेंध लगाने की रणनीति कहना फिलहाल कांग्रेस की आशंका के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

परिसीमन का मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है, क्योंकि इसका संबंध लोकसभा क्षेत्रों की सीमाओं और राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व से है। ऐसे संवैधानिक बदलावों पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाना सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए अहम है।

खरगे ने पीएम मोदी को लिखा चौथा पत्र

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयकों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग दोहराई। यह इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को लिखा गया उनका चौथा पत्र बताया गया है।

खरगे ने अपने पत्र में कहा कि राष्ट्रीय परिसीमन जैसे संवेदनशील संवैधानिक सुधारों पर एकतरफा रुख अपनाना उचित नहीं है। उनके मुताबिक, इन बदलावों का सीधा असर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं और राज्यों के क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है।

खरगे ने पत्र में याद दिलाया कि उन्होंने पहली बार 11 अप्रैल, 2026 को सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी। उनके अनुसार, 14 अप्रैल की देर शाम विधेयक सार्वजनिक किए गए और 16 अप्रैल को विशेष सत्र बुलाया गया।

उन्होंने यह भी कहा कि 17 अप्रैल को संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। इसके बाद उन्होंने 16 जुलाई और 27 अगस्त को भी पत्र लिखे थे। चौथे पत्र के जरिए उन्होंने सरकार से एकतरफा कदम उठाने के बजाय सभी राजनीतिक दलों से परामर्श करने की अपील की।

खरगे के पत्र पर किरेन रिजिजू की प्रतिक्रिया

कांग्रेस अध्यक्ष के पत्र पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस की ओर से बार-बार अनुरोध के बावजूद चर्चा के लिए तारीखें तय नहीं की गईं। उन्होंने कहा कि व्यापक सहमति बनाने के लिए सरकार ने अन्य राजनीतिक दलों से संपर्क किया।

रिजिजू के अनुसार, इस प्रस्तावित कानून पर समाजवादी पार्टी, डीएमके, वाईएसआरसीपी, एनसीपी (एसपी), शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजद समेत कई दलों के प्रतिनिधियों से परामर्श किया गया है।

रिजिजू ने मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं होने को लेकर खरगे की चिंताओं को भी खारिज किया। उन्होंने पुराने उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसके तहत अनिश्चितकाल के लिए स्थगित सदन का एक निश्चित समयसीमा के भीतर सत्रावसान करना अनिवार्य हो।

उनके मुताबिक, केवल सत्रावसान नहीं होने से संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता पैदा नहीं होती। इस तरह सरकार और कांग्रेस के बीच विवाद केवल विधेयक के समर्थन तक सीमित नहीं है, बल्कि परामर्श की प्रक्रिया और संसद के सत्र से जुड़े मुद्दे भी इसमें शामिल हैं।

सत्रावसान नहीं होने से क्या खुला रह सकता है विकल्प?

संसद के किसी सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना और उसका औपचारिक सत्रावसान करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। अनिश्चितकाल के लिए स्थगन के दौरान सदन की अगली बैठक की तारीख तय नहीं की जाती, जबकि सत्रावसान के लिए राष्ट्रपति का औपचारिक आदेश आवश्यक होता है।

मूल सामग्री के अनुसार, मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं हुआ है। इसी वजह से संसद को कम समय के नोटिस पर दोबारा बुलाए जाने की संभावना को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं।

चूंकि परिसीमन से जुड़ा प्रस्ताव संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे अध्यादेश के माध्यम से लाने का विकल्प नहीं है। ऐसे में सरकार के लिए संसद में जरूरी समर्थन जुटाना महत्वपूर्ण होगा। हालांकि, केवल सत्रावसान नहीं होने से यह साबित नहीं होता कि सरकार ने विधेयक को दोबारा पेश करने का अंतिम फैसला कर लिया है।

SIR पर एकजुट विपक्ष, लेकिन परिसीमन पर अलग-अलग रुख की आशंका

पिछले कुछ हफ्तों में SIR के विरोध को लेकर इंडी ब्लॉक और कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस के साथ एकजुट नजर आए हैं। मूल सामग्री के अनुसार, डीएमके और आम आदमी पार्टी विपक्षी गठबंधन के कार्यक्रमों से दूर रहने के बावजूद इस मुद्दे पर साथ दिखाई दिए हैं।

हालांकि, परिसीमन विधेयक को लेकर स्थिति अलग नजर आ रही है। डीएमके ने एक ओर NEET विरोधी आंदोलन का समर्थन किया है, जबकि दूसरी ओर तमिलनाडु में विजय और टीवीके सरकार को समर्थन देने के मुद्दे पर कांग्रेस पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया है।

इसके अलावा, शिवसेना (यूबीटी) और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों के रुख को लेकर भी राजनीतिक समीकरणों की चर्चा है। सरकार की ओर से क्षेत्रीय दलों से सीधे बातचीत किए जाने के बाद कांग्रेस को आशंका है कि SIR के मुद्दे पर बनी एकजुटता परिसीमन के सवाल पर कमजोर हो सकती है।

फिर भी, किसी दल के साथ बातचीत होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह दल विपक्ष से अलग हो जाएगा या विधेयक का समर्थन करेगा। इस मुद्दे पर अंतिम स्थिति संबंधित दलों के सार्वजनिक रुख और आगे की संसदीय प्रक्रिया से स्पष्ट होगी।

भाजपा की रणनीति: राज्यों के प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण पर जोर

मूल सामग्री के मुताबिक, भाजपा परिसीमन विधेयक पर आम सहमति बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों को यह भरोसा दिला रही है कि प्रस्तावित बदलावों से लोकसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित नहीं होगा। इसके लिए एक ऐसे फॉर्मूले का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत सभी राज्यों में सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ाने की बात कही गई है।

इस प्रस्ताव के समर्थन में सहमति बनाना आसान होगा या नहीं, यह राजनीतिक दलों के रुख पर निर्भर करेगा। परिसीमन के मुद्दे पर राज्यों के प्रतिनिधित्व की चिंता और महिला आरक्षण का सवाल एक साथ जुड़े होने से बहस और जटिल हो गई है।

महिला आरक्षण का मुद्दा भी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है। प्रस्तावित विधेयक का समर्थन या विरोध, दोनों ही राजनीतिक रूप से अहम हो सकते हैं। समर्थन करने वाले दल इसे महिलाओं के प्रतिनिधित्व के विस्तार के रूप में देख सकते हैं, जबकि विरोध करने वाले दल विधेयक की शर्तों और परिसीमन से जुड़े प्रभावों पर सवाल उठा सकते हैं।

इसी वजह से कांग्रेस को आशंका है कि सरकार महिला आरक्षण के समर्थन को आधार बनाकर क्षेत्रीय दलों के साथ सहमति बना सकती है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इस रणनीति से विपक्षी दलों के बीच निश्चित रूप से मतभेद पैदा हो जाएंगे।

परिसीमन विधेयक पर आगे क्या होगा?

परिसीमन विधेयक को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनाने की कोशिशें और राजनीतिक बयानबाजी जारी हैं। कांग्रेस सर्वदलीय बैठक के जरिए सभी दलों से विचार-विमर्श की मांग कर रही है, जबकि सरकार का कहना है कि वह अन्य राजनीतिक दलों से बातचीत कर रही है।

विधेयक को दोबारा पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई समर्थन जुटाना अहम होगा। वहीं, विपक्षी दलों के सामने यह चुनौती है कि SIR जैसे मुद्दों पर बनी एकजुटता को परिसीमन और महिला आरक्षण पर अलग-अलग विचारों के बीच कैसे बनाए रखा जाए।

परिसीमन विधेयक पर भाजपा और क्षेत्रीय दलों के बीच बातचीत ने कांग्रेस की चिंता बढ़ाई है। लेकिन विपक्षी एकता में वास्तविक सेंध लगेगी या नहीं, यह संबंधित दलों के अंतिम रुख और संसद में विधेयक को लेकर आगे होने वाली कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा। (Amar Bharti)

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