गलवान: ‘दोनों देशों के बीच सीमा का मसला अभी सुलझा नहीं है’

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। गलवान घाटी में 2020 में हुई झड़प ने भारत और चीन के रिश्तों को गहरे तनाव में डाल दिया था। अब पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा है कि गलवान के बाद के घटनाक्रम से यह साफ हो गया कि चीन के साथ सीमा विवाद का सैन्य समाधान अब विकल्प नहीं है। उनके मुताबिक, जिन इलाकों में सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच असहमति है, वहां झड़पें आगे भी हो सकती हैं। ऐसे में बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों की भूमिका अहम बनी हुई है।
नरवणे बोले- असहमति वाले इलाकों में झड़पें होती रहेंगी
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने चीन के साथ सीमा विवाद पर अपनी बात रखते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच सीमा का मसला अभी सुलझा नहीं है। उन्होंने ‘बॉर्डर’ के बजाय ‘बाउंड्री’ शब्द का इस्तेमाल करने की वजह भी बताई। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित और मान्यता प्राप्त होती है, जबकि बाउंड्री की परिभाषा उतनी स्पष्ट नहीं होती।
नरवणे ने कहा कि जिन इलाकों में सीमा को लेकर असहमति है, वहां पहले भी झड़पें होती रही हैं और आगे भी हो सकती हैं। उन्होंने जून 2020 की गलवान झड़प को ऐसी ही एक घटना का उदाहरण बताया।
गलवान के बाद सैन्य समाधान को लेकर क्या बदला?
नरवणे के मुताबिक, गलवान की घटना के बाद हुए घटनाक्रम ने यह स्पष्ट किया कि चीन के साथ सीमा विवाद को सैन्य तरीके से सुलझाना अब विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत ने अपना रुख साफ कर दिया है कि सीमाओं को बदलने के लिए एकतरफा बल प्रयोग स्वीकार्य नहीं है।

उनका मानना है कि इस रुख से विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिशों को नई गति मिली। उन्होंने दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण बताया।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति का किया जिक्र
पूर्व सेना प्रमुख ने कहा कि गलवान के बाद की घटनाओं से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख मजबूत हुई है। उनके मुताबिक, सैन्य, कूटनीतिक और राजनीतिक—तीनों स्तरों पर भारत की स्थिति को मजबूती मिली है।
नरवणे ने सीमा विवाद के समाधान के लिए भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जारी रखने के महत्व पर जोर दिया। उनके बयान का मुख्य संदेश यही है कि सीमा पर असहमति के बावजूद विवाद को सुलझाने के लिए संवाद की प्रक्रिया जरूरी है।
गलवान झड़प के बाद भारत-चीन संबंधों में क्या हुआ?
जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ गया था। पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक सैन्य गतिरोध बना रहा और दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास सैनिकों तथा सैन्य उपकरणों की तैनाती की।
इसके बाद तनाव कम करने और टकराव वाले स्थानों से सैनिकों को पीछे हटाने के लिए दोनों देशों के बीच कई दौर की सैन्य और राजनयिक बातचीत हुई।
अक्टूबर 2024 में भारत और चीन पूर्वी लद्दाख के डेपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में गश्त की व्यवस्था पर सहमत हुए। इससे 2020 के गतिरोध से जुड़े शेष टकराव वाले बिंदुओं से सैनिकों को पीछे हटाने में मदद मिली। हालांकि, इस समझौते से सीमा का व्यापक विवाद हल नहीं हुआ।
अगस्त 2025 में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक भी हुई। दोनों देशों ने मतभेदों को संभालते हुए संबंध सुधारने की कोशिश जारी रखी। सीमा विवाद पर बातचीत के लिए विशेष प्रतिनिधि तंत्र भी सक्रिय रहा है।

सीमा विवाद में बातचीत की भूमिका अहम
पूर्व सेना प्रमुख नरवणे के बयान के मुताबिक, गलवान झड़प ने भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर सैन्य विकल्पों की सीमाएं स्पष्ट कर दीं। उन्होंने असहमति वाले क्षेत्रों में भविष्य में भी झड़पों की आशंका जताई, लेकिन साथ ही बातचीत और विशेष प्रतिनिधियों के बीच संवाद को विवाद सुलझाने का अहम रास्ता बताया। (Amar Bharti)
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