बंगाल की सियासत: मुद्दों की जंग या नैरेटिव की लड़ाई?

पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मी तेज हो चुकी है और एक बार फिर मुकाबला मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच सिमटता नजर आ रहा है। लेकिन यह चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि मुद्दों, विचारधाराओं और नैरेटिव की भी टक्कर बन चुका है।

टीएमसी, जिसकी अगुवाई ममता बनर्जी कर रही हैं, इस चुनाव में अपने पारंपरिक “वेलफेयर मॉडल” को सबसे बड़ा हथियार बना रही है। “लक्ष्मी भंडार”, “कन्याश्री” और “स्वास्थ्य साथी” जैसी योजनाओं के जरिए पार्टी महिलाओं, गरीबों और ग्रामीण वोटरों को साधने की कोशिश में है। इसके साथ ही टीएमसी बंगाल की “अस्मिता” और “बाहरी बनाम स्थानीय” के मुद्दे को भी जोर-शोर से उठा रही है, जिसमें बीजेपी को “बाहरी ताकत” के रूप में पेश किया जाता है।

वहीं दूसरी ओर बीजेपी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय नेतृत्व के चेहरे पर चुनाव लड़ते हुए “डबल इंजन सरकार” के नारे के साथ मैदान में है। पार्टी का फोकस केंद्र की योजनाओं—जैसे आवास, शौचालय, मुफ्त राशन और इंफ्रास्ट्रक्चर—को राज्य में बेहतर तरीके से लागू करने के वादे पर है। इसके अलावा बीजेपी “कानून-व्यवस्था”, “भ्रष्टाचार” और “राजनीतिक हिंसा” जैसे मुद्दों को लगातार उठा रही है, जो बंगाल की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं।

धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा रहा है। बीजेपी जहां “हिंदुत्व” और धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश करती है, वहीं टीएमसी खुद को “सर्वधर्म समभाव” और क्षेत्रीय गौरव के पक्षधर के रूप में पेश करती है।

इन सबके बीच बेरोजगारी, उद्योगों की कमी, और युवाओं का पलायन जैसे बुनियादी मुद्दे भी मौजूद हैं, लेकिन अक्सर ये बड़े राजनीतिक नैरेटिव के शोर में दब जाते हैं। सवाल यह है कि क्या इस बार चुनाव विकास और रोजगार जैसे ठोस मुद्दों पर केंद्रित होगा, या फिर पहचान और भावनात्मक राजनीति हावी रहेगी?

पश्चिम बंगाल में दो फेज में चुनाव होगा. पहले चरण में 23 अप्रैल को वोटिंग होगी जबकि दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा. 4 मई को चुनाव के नतीजे आएंगे। पांचों राज्यों-केंद्रशासित प्रदेश में कुल 17.4 करोड़ मतदाता हैं. जबकि यहां सीटों की कुल संख्या 824 है. असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में प्रति मतदान केंद्र पर मतदाताओं की औसत संख्या 750-900 है.

5 राज्यों में पिछली बार चुनाव की तारीखों का ऐलान 26 फरवरी 2021 को किया गया था. तब पश्चिम बंगाल में 8 फेज में वोटिंग हुई थी. असम में 3 चरणों में मतदान हुआ था जबकि  तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में एक चरण में वोट डाले गए थे. इन पांचों राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल मई में खत्म हो रहा है.

अंततः, बंगाल का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि इस बात का भी संकेत होगा कि राज्य की जनता किस प्रकार की राजनीति को प्राथमिकता देती है—कल्याणकारी योजनाओं और क्षेत्रीय पहचान को, या फिर राष्ट्रीय एजेंडे और मजबूत केंद्रीय नेतृत्व को।

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