अर्थव्यवस्था में तेज़ी के दावों के बीच बड़ा सवाल — अगर सबकुछ इतना मजबूत है तो रुपया लगातार कमजोर क्यों?

96 रुपए तक पहुंचने की चर्चा ने आर्थिक बहस को तेज कर दिया है, वैश्विक बाजार की स्थिति तय करेगी कि भारतीय रुपए की मजबूती

भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जा रही है। सरकार लगातार GDP ग्रोथ, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और विदेशी निवेश जैसे आंकड़ों को उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। लेकिन दूसरी ओर एक बड़ा सवाल लगातार उठ रहा है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रही है, तो भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर क्यों होता जा रहा है? यही सवाल अब सोशल मीडिया से लेकर आर्थिक विशेषज्ञों तक चर्चा का विषय बन गया है।

साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब एक अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 58.94 रुपए थी। इसके बाद 2019 में दूसरे कार्यकाल की शुरुआत तक डॉलर लगभग 69.37 रुपए पर पहुंच गया। जून 2024 तक यह आंकड़ा 83.38 रुपए तक पहुंच गया और अब तीसरे कार्यकाल के दो वर्षों के भीतर डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 96 रुपए तक पहुंचने की चर्चा ने आर्थिक बहस को और तेज कर दिया है। इसका मतलब है कि 2014 से अब तक भारतीय रुपए में भारी गिरावट दर्ज हुई है।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार किसी भी देश की मुद्रा केवल सरकार के दावों या GDP ग्रोथ से मजबूत नहीं होती, बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारक उसकी कीमत तय करते हैं। डॉलर दुनिया की रिजर्व करेंसी मानी जाती है। जब भी वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बढ़ती है, निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर डॉलर की ओर भागते हैं। इससे डॉलर मजबूत होता है और विकासशील देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।

हाल के वर्षों में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी रुपए की कमजोरी का बड़ा कारण माना जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है और तेल का भुगतान डॉलर में होता है। जब तेल महंगा होता है, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। इसके अलावा व्यापार घाटा यानी आयात और निर्यात के बीच बढ़ता अंतर भी रुपए पर दबाव डालता है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने का असर भी भारतीय मुद्रा पर पड़ता है। जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं। इससे विदेशी निवेश में कमी आती है और भारतीय रुपए पर दबाव बढ़ता है। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर निकासी भी देखी गई है।

हालांकि सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है कि केवल रुपए की गिरावट देखकर अर्थव्यवस्था का आकलन करना सही नहीं होगा। उनका कहना है कि दुनिया के कई देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं। सरकार यह भी दावा करती है कि भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है और इंफ्रास्ट्रक्चर तथा डिजिटल सेक्टर में तेजी से विकास हुआ है। सरकार के मुताबिक वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर बनी हुई है।

दूसरी ओर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है। विपक्ष का कहना है कि 2013-14 में जब रुपया कमजोर होता था तब भाजपा नेताओं द्वारा तत्कालीन यूपीए सरकार पर सवाल उठाए जाते थे। अब वही स्थिति और ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है। आलोचकों का कहना है कि यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूत होती, तो रुपए में इतनी तेज गिरावट नहीं आती। विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई और बढ़ते आयात बिल को भी रुपए की कमजोरी से जोड़कर देख रहा है।

अगर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल की बात करें तो 2004 से 2014 के बीच रुपया लगभग 31.65 प्रतिशत तक कमजोर हुआ था। वहीं वर्तमान सरकार के कार्यकाल में रुपए की गिरावट का प्रतिशत इससे काफी अधिक बताया जा रहा है। हालांकि अर्थशास्त्री यह भी मानते हैं कि दोनों समय की वैश्विक परिस्थितियां अलग थीं। कोविड महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक मंदी का खतरा और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कई कारकों ने वर्तमान दौर की आर्थिक चुनौतियों को और जटिल बना दिया है।

रुपए की गिरावट का सीधा असर आम जनता पर भी पड़ता है। जब रुपया कमजोर होता है तो पेट्रोल-डीजल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक सामान और विदेश से आयात होने वाली वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों का खर्च भी बढ़ जाता है। हालांकि निर्यात करने वाले कुछ सेक्टरों को कमजोर रुपए से फायदा भी होता है क्योंकि भारतीय सामान विदेशी बाजारों में सस्ता पड़ता है।

भारतीय रिजर्व बैंक लगातार रुपए को स्थिर बनाए रखने की कोशिश करता है। RBI समय-समय पर डॉलर बेचकर बाजार में संतुलन बनाने की कोशिश करता है ताकि रुपए में अचानक बड़ी गिरावट न आए। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक केवल हस्तक्षेप के जरिए मुद्रा को नियंत्रित रखना आसान नहीं होता।

फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपए की स्थिति को लेकर बहस लगातार जारी है। एक पक्ष इसे वैश्विक परिस्थितियों का असर बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे आर्थिक नीतियों की विफलता के रूप में देख रहा है। आने वाले वर्षों में भारत की विकास दर, विदेशी निवेश, रोजगार, निर्यात और वैश्विक बाजार की स्थिति तय करेगी कि भारतीय रुपया फिर मजबूत होता है या डॉलर के मुकाबले और दबाव में आता है।

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