‘अन्ना’ से ‘कॉकरोच’ तक की गवाह है दिल्ली की मिट्टी, सावधान! युवाओं के सपनों की भट्टी में सियासत सेंक न ले अपनी रोटियां

कहते हैं मज़ाक में कही गई बात में भी सही तथ्य छिपा होता है. इसका एक जीता जागता उदाहरण देखने को मिल रहा है अभिजीत दीपके के रूप में. NEET पेपर लीक के बाद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की आई एक टिप्पणी ने युवाओं को आहत किया. कई युवाओं ने उनकी बात को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएं दी. किसी ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में दुख जताकर तो किसी ने वीडियो बनाकर लेकिन एक पोस्ट ने सबका ध्यान खींचा और महज़ एक दिन में सात मिलियन के आंकड़े को छूने वाला ये अपने आप में पहला पोस्ट बन गया और वह पोस्ट था कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके का. अभिजीत दीपके ने सीजेआई के उस स्टेटमेंट को आधार बनाकर युवाओं को आकर्षित किया.
‘पोस्ट’ से प्रसिद्धि तक ‘कॉकरोच’
देखते ही देखते कॉकरोच जनता पार्टी के नाम की यह पोस्ट देश में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में सुर्खियां बटोरने लगी. हालात यह हो गए कि पोस्ट को वायरल होते देख इसे सोशल मीडिया पर गायब कर दिया गया. आरोप लगे कि सरकार युवाओं को अनदेखा कर उनके करियर के साथ खिलवाड़ कर रही है. सत्तर से ज्यादा पेपर्स के लीक आउट होने पर युवाओं को अपनी बात तक रखने का मौका नहीं दिया जा रहा. सरकार के खिलाफ दूसरे राजनीतिक दल भी युवाओं के इस आंदोलन से जुड़ने लगे. भारत के जाने-माने वैज्ञानिक सोनम वांगचुक भी युवाओं के इस आंदोलन का हिस्सा बनने को बेताब हो गए. सोनम वांगचुक पर हाल ही में एनएसए लगाया गया था और करीब छह महीने जेल में रहने के बाद उन्हें छोड़ा गया.
सत्ता के महारथियों का साथ कितना फायदेमंद
सत्ता में वापसी का सपना संजोए लीडर ऑफ अपोजीन राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के फाउंडर अरविंद केजरीवाल अपने-अपने तरीके से पेपर लीक के अभ्यर्थियों से मुलाकात कर रहे हैं. आम आदमी पार्टी के संजय सिंह को तो प्रशासन ने युवाओं से बैठक करने तक के लिए ही मना कर दिया. एक तरफ कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर कई राजनीतिक दल इस आंदोलन की आग में अपनी-अपनी रोटियां सेंकने के लिए लालायित दिख रहे हैं.
‘अन्ना’ से ‘अभिजीत’ तक?
अब आंदोलन के आगे की तस्वीर कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर पर हो रहे प्रदर्शन में नज़र आएगी. अभिजीत दीपके भारत आ चुके हैं. जंतर-मंतर पर युवाओं का हुजूम लागातर बढ़ता जा रहा है. जंतर-मंतर की तस्वीर ठीक वैसी ही है जैसी कभी काँग्रेस के खिलाफ चलाए गए अन्ना हजारे के आंदोलन की थी. आज अन्ना तो किनारे लगा दिए गए लेकिन अन्ना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वालों ने अपनी-अपनी सरकारें स्थापित कर लीं. बेचारे अन्ना राजनीति का शिकार हो गए और उस वक्त गांधी से जिनकी तुलना हो रही थी अब बीजेपी का मोहरा होने का आरोप झेल रहे हैं.
सरकार की सोच?
खैर, बात कॉकरोच जनता पार्टी की. यह आंदोलन नहीं है यह युवाओं की महज़ एक प्रतिक्रिया भर है वह भी अपने भविष्य को अंधकार में देखने के बाद की. हैरानी इस बात की है कि शासन में बैठे लोग खामोशी से बैठकर युवाओं की बेचैनी को महज़ देख रहे हैं. कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे. किसी की जिम्मेदारी तय नहीं कर रहे. ऐसे में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग सिवाय एक सपने से ज्यादा कुछ नहीं है.
आंदोलन का भविष्य?
आंदोलन तो ओलंपिक में मेडल पाने वाली आधी आबादी ने भी किया था. समर्थन उसको भी मिला था लेकिन उसका हश्र क्या हुआ सभी जानते हैं. आज वापसी तो छोड़िए उनको कोई पूछ भी नहीं रहा. आज भले ही अभिजीत दीपके एक सोशल मीडिया पर डाली गई मीम के जरिए युवाओं को जोड़ने की पहल कर चुके हैं लेकिन उनका भविष्य का एजेंडा क्या सिर्फ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक ही सीमित है या फिर युवाओं के इस जोश को और बढ़ाकर उनके सपनों को सही आकार देकर पूरा करने की है. यह एक बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल है. फिलहाल सबकी नज़र प्रदर्शन पर टिकी है लेकिन आशंका यही है कि यह प्रदर्शन भी अन्य प्रदर्शनों की तरह राजनीति की भेंट न चढ़ जाए.