विद्रोह: लगभग 58-60 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना

पश्चिम बंगाल: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में ऐतिहासिक विद्रोह सामने आया है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने पार्टी की संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चेयरपर्सन पद से हटा दिया है। साथ ही उनके भतीजे और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया है। इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को हिला दिया है।
विद्रोह का पृष्ठभूमि और ट्रिगर
2026 के विधानसभा चुनावों में TMC की हार के बाद पार्टी में असंतोष चरम पर पहुंच गया। लगभग 58-60 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना और विधानसभा स्पीकर से मान्यता भी प्राप्त कर ली। बागी गुट का आरोप है कि पार्टी की 2022 वाली कार्यसमिति की मियाद खत्म हो चुकी है, जिसके चलते उन्होंने नई समिति गठित की।
फिलहाल देखना है कि इस विद्रोह का जवाब ममता बनर्जी कैसे देती हैं।
नोवोटेल में हुई बागी गुट की अहम बैठक में अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित किया गया। फिरहाद हाकिम और अरूप विश्वास को उपाध्यक्ष बनाया गया। इस फैसले को ‘संवैधानिक संकट’ को दूर करने का कदम बताया गया। (PIB)
ममता और अभिषेक पर क्या आरोप?
बागी गुट ने ममता बनर्जी पर प्रत्यक्ष हमला नहीं किया, लेकिन अभिषेक बनर्जी पर केंद्रित हमले तेज कर दिए। आरोप है कि अभिषेक ने पार्टी में एकतरफा फैसले लिए, वरिष्ठ नेताओं को किनारे किया और सत्ता का केंद्रीकरण किया। विधायक स्तर पर लीडर ऑफ अपोजिशन की नियुक्ति में हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप भी लगे, जो आग को भड़काने वाला ट्रिगर बना।
ममता को चेयरपर्सन पद से हटाने के साथ बागी गुट ने खुद को ‘असली TMC’ घोषित किया है। उन्होंने पार्टी नाम, प्रतीक और संपत्ति पर भी दावा जताया है।
अरूप रॉय नई अध्यक्ष, नई कार्यसमिति गठित
बागी गुट ने 20 सदस्यीय नई कार्यसमिति का गठन किया। अरूप रॉय को अध्यक्ष बनाकर पुराने और अनुभवी नेताओं को आगे लाया गया। यह कदम वरिष्ठ नेताओं के असंतोष को शांत करने का प्रयास माना जा रहा है।
बैठक में ममता बनर्जी की भूमिका को ‘मुख्य सलाहकार’ जैसा बनाने की चर्चा भी हुई, लेकिन विद्रोह करने वाले गुट ने आधिकारिक रूप से उन्हें हटा दिया।
यह फैसला TMC के 28 साल के इतिहास में सबसे बड़ा आंतरिक टूट माना जा रहा है। वहीं इस विद्रोह के कई मायने निकाले जा रहे हैं।
लोकसभा में भी बवाल: 20 सांसदों का विद्रोह
विधानसभा के बाद लोकसभा में भी विद्रोह फैला। लगभग 20 TMC सांसदों ने NDA का साथ देने और अलग ग्रुप बनाने की कोशिश की। काकोली घोष दस्तिदार जैसे नेताओं ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात कर अलग मान्यता मांगी। अभिषेक बनर्जी ने इन सांसदों की अयोग्यता के लिए याचिकाएं दाखिल कीं।
अभिषेक ने दावा किया कि 10वीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन लॉ) के तहत अलग सीटिंग या लीडरशिप की मांग मान्य नहीं है। विद्रोह करने वाले नियम का उल्लंघन कर रहे हैं।
TMC की हार के बाद बढ़ा असंतोष
पश्चिम बंगाल में 2026 चुनावों में TMC की करारी हार ने पार्टी को कमजोर किया। सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के BJP में जाने और अन्य असंतुष्टों के बढ़ते प्रभाव ने स्थिति बिगाड़ी। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक पर ‘डायनेस्टी पॉलिटिक्स’ और ‘एकाधिकार’ के आरोप लगते रहे, जो अब विद्रोह का मुख्य मुद्दा बन गए।
बागी गुट का कहना है कि वे ममता के प्रति वफादार हैं, लेकिन अभिषेक के नेतृत्व को लेकर उनका विद्रोह कायम है।
राजनीतिक प्रभाव और भविष्य
यह विद्रोह TMC को दो हिस्सों में बांट सकता है। पार्टी नाम, चुनाव चिन्ह और संपत्ति पर कानूनी लड़ाई अपरिहार्य लग रही है। चुनाव आयोग और अदालतों में मामले जा सकते हैं।
BJP और NDA के लिए यह अच्छा मौका है। बागी गुट पहले ही NDA की ओर झुकाव दिखा चुका है। वहीं, ममता बनर्जी के पास अब सीमित सांसद और विधायक बचे हैं। वे कांग्रेस या INDIA गठबंधन के साथ नई रणनीति बना सकती हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह बदलाव सत्ता संतुलन को पूरी तरह प्रभावित करेगा। बागी गुट की मजबूत स्थिति के चलते TMC की ‘असली’ पहचान पर सवाल उठ गए हैं।
ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया और आगे की राह
ममता बनर्जी ने अभी तक औपचारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन उनके करीबी नेताओं ने विद्रोह को ‘अवसरवादी’ बताया है। अभिषेक बनर्जी सक्रिय रूप से स्पीकर और अदालतों में लड़ाई लड़ रहे हैं।
TMC के वफादार गुट का दावा है कि वे मूल पार्टी हैं और बागियों को अयोग्य ठहराया जाना चाहिए। यह संकट लंबा खिंच सकता है। (Amar Bharti)
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