SIR पर टिप्पणी से चर्चा में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां

जस्टिस उज्जल भुइयां: भारतीय नागरिकता और वोटिंग अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं

जस्टिस उज्जल भुइयां की SIR पर टिप्पणी
जस्टिस उज्जल भुइयां की SIR और वोटिंग अधिकार पर टिप्पणी के बाद पुराने बयानों की चर्चा।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की SIR को लेकर की गई हालिया टिप्पणी के बाद उनके पुराने बयानों की भी चर्चा हो रही है। उन्होंने भारतीय नागरिक के वोटिंग अधिकार को संविधान का अभिन्न हिस्सा बताते हुए कहा कि किसी नागरिक को इस अधिकार से वंचित करना उसे अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा होगा।

जस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 326 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती और संविधान से ऊपर कोई नहीं है। इससे पहले भी वह लोकतंत्र, पुलिस की भूमिका, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, पर्यावरण और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर अलग-अलग मौकों पर टिप्पणी कर चुके हैं।

SIR पर जस्टिस उज्जल भुइयां ने वोटिंग अधिकार को लेकर क्या कहा

देशभर में SIR को लेकर जारी विवाद के बीच जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी चर्चा में आई। रविवार को एक कार्यक्रम में उन्होंने भारतीय नागरिकता और वोटिंग अधिकार के संबंध को लेकर अपनी बात रखी।

उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक की नागरिकता और उसका वोटिंग अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उनके मुताबिक किसी भारतीय नागरिक को वोट देने के अधिकार से वंचित करना उसे अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा होगा।

जस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 326 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान से ऊपर कोई नहीं है।

प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर उठाए सवाल

4 सितंबर को दिल्ली में पूर्व सुरक्षा सचिव यशोवर्धन आजाद की किताब ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक’ के विमोचन कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की मारपीट को लेकर चिंता जताई थी।

उन्होंने युवा IPS अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करते देखे जाने को ‘बेहद परेशान करने वाला’ बताया था। उन्होंने सवाल किया था कि क्या पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाते ही कोई नागरिक अपने मौलिक अधिकार खो देता है?

जस्टिस भुइयां ने कहा था कि आम आदमी के लिए सड़क पर मौजूद पुलिसकर्मी राज्य की शक्ति और अधिकार को रिप्रेजेंट करता है। इसलिए पुलिस के लिए अपनी क्रेडिबिलिटी बनाए रखना जरूरी है। उनके मुताबिक यह संविधान का पालन, निष्पक्षता, ईमानदारी और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर चलते हुए ही संभव है।

पर्यावरण को लेकर भी जस्टिस भुइयां की टिप्पणी

8 अगस्त को गुवाहाटी के विवेकानंद केंद्र में ‘विकास और स्थिरता के बीच संतुलन’ विषय पर बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी थी।

उन्होंने कहा था कि पर्यावरण और पर्यावरणीय क्षरण ऐसे मुद्दे नहीं हैं, जिनसे सब्सिडी, नौकरियों या पहचान की राजनीति की तरह राजनीतिक लाभ हासिल किया जा सके। उन्होंने कहा कि पर्यावरण से कोई बड़ा वोट बैंक नहीं जुड़ा है, इसलिए यह राजनीतिक दलों और सरकारों की प्राथमिकता नहीं है।

उन्होंने कहा था कि ऐसे में नागरिकों और अदालतों को पर्यावरण से जुड़े मुद्दे उठाने होंगे।

न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता को लेकर टिप्पणी

1 अगस्त को दिल्ली में ‘द ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स’ रिपोर्ट के विमोचन के दौरान जस्टिस भुइयां ने न्यायिक नियुक्तियों में ज्यादा पारदर्शिता की जरूरत पर टिप्पणी की थी।

उन्होंने कहा था कि पारदर्शिता की कमी ऐसे लोगों को न्यायपालिका में आने का मौका दे सकती है, जो बाद में लोगों के किसी समूह को ‘चींटियां’ जैसे शब्दों से संबोधित करें। उन्होंने ऐसी टिप्पणी को ‘पूरी तरह असंवैधानिक’ बताया था।

साथ ही उन्होंने संभावित जजों को लेकर सार्वजनिक चर्चा की जरूरत पर भी जोर दिया था।

लोकतांत्रिक असहमति की जगह कम होने पर जताई चिंता

25 जुलाई को भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान जस्टिस भुइयां ने भारत में लोकतांत्रिक असहमति के लिए जगह कम होने की बात कही थी।

उन्होंने कहा था कि विरोध और अपने विचार व्यक्त करने के मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले छात्रों, कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई बढ़ रही है।

उनके मुताबिक शांतिपूर्ण बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं। उन्होंने कहा था कि इसके जवाब में गिरफ्तारी, लंबे समय तक जेल और जमानत की कड़ी शर्तें देखने को मिल रही हैं।

मुस्लिम और दलित से भेदभाव के उदाहरण का जिक्र

21 फरवरी को हैदराबाद में जस्टिस भुइयां ने संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच अंतर की बात कही थी।

उन्होंने एक मुस्लिम पीएचडी छात्रा को दिल्ली में नाम के कारण आवास नहीं मिलने और ओडिशा में दलित महिला के हाथ का बना खाना बच्चों को खिलाने से अभिभावकों के इनकार की घटनाओं का उदाहरण दिया था।

उन्होंने कहा था कि अदालतों का कर्तव्य लोकप्रिय जनमत के बजाय संवैधानिक मूल्यों के आधार पर मामलों का फैसला करना है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की मूल विशेषता बताया

इससे पहले 24 जनवरी को जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की मूल विशेषता और ऐसा सिद्धांत बताया था, जिससे समझौता नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा था कि अगर न्यायपालिका अपनी विश्वसनीयता खो देती है तो अदालतें और जज तो मौजूद रहेंगे, लेकिन उसकी ‘आत्मा’ खत्म हो जाएगी।

इन अलग-अलग मौकों पर दिए गए बयानों को देखें तो जस्टिस उज्जल भुइयां ने लोकतांत्रिक असहमति, पुलिस की भूमिका, पर्यावरण, न्यायिक नियुक्तियों, सामाजिक भेदभाव और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर अपनी चिंताएं और विचार सामने रखे हैं। SIR पर उनकी हालिया टिप्पणी के बाद एक बार फिर उनके पुराने बयानों की चर्चा हो रही है।

टिप्पणी के मायने

SIR पर जस्टिस उज्जल भुइयां की हालिया टिप्पणी में वोटिंग अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 326 को लेकर उनकी बात चर्चा में आई है। इससे पहले भी जस्टिस भुइयां अलग-अलग मौकों पर लोकतंत्र, पुलिस, न्यायपालिका, पर्यावरण और सामाजिक भेदभाव जैसे विषयों पर टिप्पणी कर चुके हैं। उनके इन बयानों के कारण SIR टिप्पणी के बाद उनके पुराने वक्तव्यों को भी फिर से चर्चा में लाया जा रहा है। (Amar Bharti)

एक नज़र इन पर भी डालें

जंतर-मंतर प्रदर्शन में 3 FIR दर्ज; करीब 1,000 लोग हिरासत में

3 देशों की सुरक्षा में चूक और Flydubai की बड़ी लापरवाही: इजरायल का ‘9/11’ कैसे टला?

One thought on “SIR पर टिप्पणी से चर्चा में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *