मीरा कुमार: पटना DM का आदेश रद्द, जमीन की जमाबंदी बहाल करने का निर्देश

डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार की राजधानी पटना में जमीन अधिग्रहण से जुड़े करीब 50 साल पुराने मामले में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को बड़ी राहत मिली है। पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार और पटना के जिलाधिकारी (DM) के आदेश को रद्द करते हुए जमीन की जमाबंदी बहाल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले में जिलाधिकारी के अधिकार क्षेत्र और कानूनी प्रक्रिया को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की।
मीरा कुमार जमीन मामला: क्या है पूरा विवाद?
मीरा कुमार जमीन मामले की शुरुआत वर्ष 1976 में हुई थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पटना के शास्त्री नगर और फुलवारी क्षेत्र में नाला निर्माण के लिए उनकी माता इंद्राणी देवी की 18 कट्ठा 10 धुर जमीन का अधिग्रहण किया गया था।
आरोप है कि जमीन अधिग्रहण के करीब 50 साल बाद भी इंद्राणी देवी या उनकी वारिस मीरा कुमार को मुआवजे की राशि नहीं मिली। मुआवजे की मांग किए जाने के बाद मामला जिला प्रशासन तक पहुंचा।
इसके बाद प्रशासन ने संबंधित जमीन को ‘गैरमजरुआ आम’ और ‘पिछली नदी’ बताते हुए जमाबंदी रद्द कर दी। मीरा कुमार की ओर से आरोप लगाया गया कि यह कार्रवाई बिना नोटिस दिए की गई थी। इसी विवाद को लेकर मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने DM के आदेश को क्यों रद्द किया?
जस्टिस खतीम रजा की एकल पीठ ने बिहार सरकार और पटना के जिलाधिकारी के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत की टिप्पणी के अनुसार, बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 4(h) के तहत वर्ष 1946 से पहले की बंदोबस्ती को रद्द करने का अधिकार जिलाधिकारी के पास नहीं है।
कोर्ट ने जिलाधिकारी के आदेश को गैर-कानूनी, अधिकार क्षेत्र से बाहर और शून्य बताया। इस फैसले से जमीन की जमाबंदी रद्द करने की प्रशासनिक कार्रवाई को चुनौती देने वाली मीरा कुमार की याचिका को राहत मिली।
मामले में अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि जमीन की बंदोबस्ती वर्ष 1941 की बताई गई थी। ऐसे में धारा 4(h) के तहत कार्रवाई की वैधता पर सवाल खड़ा हुआ।

2016 की जांच रिपोर्ट का भी हुआ उल्लेख
मामले में जिलाधिकारी की ओर से गठित तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण रही। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, समिति ने वर्ष 2016 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि संबंधित जमीन का पट्टा वर्ष 1941 का है। इसलिए इस मामले में बिहार भूमि सुधार अधिनियम की धारा 4(h) लागू नहीं होती।
इसके बावजूद आरोप है कि प्रशासन ने अपनी ही जांच समिति की रिपोर्ट पर आगे कार्रवाई नहीं की। हाईकोर्ट के समक्ष इस रिपोर्ट का उल्लेख जमीन से जुड़े विवाद और प्रशासनिक आदेश की वैधता के संदर्भ में महत्वपूर्ण रहा।
इस मामले में 2016 की रिपोर्ट और जिलाधिकारी के बाद के आदेश के बीच का अंतर भी विवाद का अहम पहलू बना। अदालत की टिप्पणी ने संबंधित कानूनी प्रावधान के तहत जिलाधिकारी के अधिकारों की सीमा को स्पष्ट किया।
जमाबंदी बहाल करने और मुआवजे पर क्या निर्देश?
पटना हाईकोर्ट ने जमीन की जमाबंदी बहाल करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के इंदौर विकास प्राधिकरण बनाम मनोहरलाल फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मीरा कुमार भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के तहत मुआवजा पाने की हकदार हैं।
यह मामला लंबे समय से लंबित जमीन अधिग्रहण और मुआवजे के विवाद से जुड़ा है। मूल जानकारी के अनुसार, अधिग्रहण के बाद मुआवजा नहीं मिलने का आरोप इस पूरे मामले का प्रमुख आधार रहा है।
अदालत के आदेश से जमाबंदी बहाल करने का रास्ता खुला है और मुआवजे के अधिकार को लेकर भी कानूनी स्थिति पर टिप्पणी की गई है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में मुआवजे की अंतिम राशि या भुगतान की निश्चित तारीख का उल्लेख नहीं है।

मीरा कुमार जमीन मामले में हाईकोर्ट के फैसले का सार
पटना हाईकोर्ट ने करीब 50 साल पुराने जमीन अधिग्रहण विवाद में मीरा कुमार को राहत देते हुए जिलाधिकारी का आदेश रद्द कर दिया और जमाबंदी बहाल करने का निर्देश दिया। अदालत ने 1941 की बंदोबस्ती, 2016 की जांच रिपोर्ट और बिहार भूमि सुधार अधिनियम की धारा 4(h) के संदर्भ में प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए। मुआवजे के मामले में भी कोर्ट ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून का हवाला दिया। (Amar Bharti)
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