मौत की सजा में फांसी की सज़ा बरकरार, 3 फैसलों को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग ठुकराई

मौत की सजा में फांसी पर 22 जनवरी को सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने सुरक्षित रखा था फैसला

मौत की सजा में फांसी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा में फांसी के मौजूदा तरीके को फिलहाल जारी रखा।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को फांसी के बजाय कम दर्दनाक तरीके से दिए जाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने फांसी देकर मौत की सजा देने के मौजूदा संवैधानिक आधार को बरकरार रखते हुए साफ किया कि फिलहाल देश में मौत की सजा के लिए फांसी का तरीका ही जारी रहेगा।

याचिका में फांसी के स्थान पर जहरीले इंजेक्शन समेत दूसरे विकल्पों को अपनाने की मांग की गई थी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित साक्ष्य सामने आने पर इस मुद्दे पर दोबारा संवैधानिक जांच का रास्ता खुला रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा में फांसी पर क्या कहा

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए पहले के तीन फैसलों को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग भी स्वीकार नहीं की। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि मौत की सजा देने के मौजूदा तरीके की संवैधानिक वैधता पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए।

हालांकि, बेंच ने कहा कि पहले के फैसलों को बड़ी बेंच के पास भेजने के लिए कोई ठोस आधार नहीं है। इस तरह फिलहाल मौत की सजा में फांसी का तरीका देश में लागू व्यवस्था के तौर पर जारी रहेगा।

याचिका में फांसी को बेहद दर्दनाक, अमानवीय और क्रूर बताया गया था। इसमें यह मांग भी की गई कि सीआरपीसी की धारा 354(5) के तहत फांसी की सजा को असंवैधानिक घोषित किया जाए और सम्मान के साथ मरने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जाए।

याचिका में किन वैकल्पिक तरीकों का सुझाव दिया गया

वकील ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर याचिका में मौत की सजा के लिए फांसी के अलावा कई विकल्पों का उल्लेख किया गया। इनमें जहरीला इंजेक्शन, गोली मारना, बिजली का झटका देना और गैस चैंबर जैसे तरीके शामिल थे।

याचिका में दावा किया गया कि इन वैकल्पिक तरीकों से दोषी की मौत कुछ ही मिनटों में हो सकती है। याचिकाकर्ता ने फांसी की प्रक्रिया और उससे जुड़ी पीड़ा को लेकर भी अदालत के सामने अपनी दलीलें रखीं।

याचिका में कहा गया कि फांसी के बाद मौत घोषित करने में लगभग 40 मिनट लगते हैं, जबकि गोली मारने या जानलेवा इंजेक्शन से यह प्रक्रिया लगभग 5 मिनट में पूरी हो सकती है। मल्होत्रा ने संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि जहां मौत की सजा लागू है, वहां इसे इस तरह अमल में लाया जाना चाहिए जिससे कम से कम तकलीफ हो।

केंद्र सरकार ने वैकल्पिक तरीके पर क्या कहा

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया था कि सरकार ने इस विषय पर विचार करने के लिए एक समिति का गठन किया है।

15 अक्टूबर 2025 को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख को लेकर नाराजगी जताई थी। सुनवाई के दौरान दोषियों को फांसी या जहरीले इंजेक्शन में से किसी एक तरीके को चुनने का विकल्प देने का सुझाव भी सामने आया था।

हालांकि, केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि इस तरह का विकल्प देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। केंद्र की ओर से पेश सीनियर वकील सोनिया माथुर ने दलील दी थी कि यह मामला पॉलिसी से जुड़ा है।

इसी दौरान बेंच ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि समस्या यह है कि सरकार बदलने को तैयार नहीं है। अदालत ने यह भी कहा था कि यह बहुत पुरानी प्रक्रिया है और समय के साथ चीजें बदल गई हैं।

भविष्य में फिर हो सकती है संवैधानिक जांच

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण बात भी स्पष्ट की। अदालत ने कहा कि इस याचिका को खारिज करने का अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में इस विषय पर संवैधानिक जांच का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया है।

कोर्ट के मुताबिक, अगर भविष्य में ऐसे ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित साक्ष्य सामने आते हैं, जिनसे यह साबित हो कि पहले के फैसले में जिस तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार पर निष्कर्ष निकाला गया था, वह बाद की घटनाओं के कारण काफी हद तक बदल चुका है, तो संवैधानिक जांच की जा सकती है।

इसका मतलब है कि फिलहाल मौत की सजा में फांसी की मौजूदा व्यवस्था बनी रहेगी, लेकिन नए ठोस प्रमाण सामने आने पर इस व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

केंद्र चाहे तो विशेषज्ञ समिति बना सकता है

अदालत ने केंद्र सरकार के लिए भी एक विकल्प खुला रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर केंद्र चाहे तो मौत की सजा देने के वैकल्पिक तरीकों की व्यापक समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 22 जनवरी को सुनवाई पूरी कर ली थी और अपना फैसला सुरक्षित रखा था। अब अदालत ने याचिका खारिज करते हुए वर्तमान व्यवस्था को फिलहाल जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया है।

आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद देश में मौत की सजा के लिए फांसी का मौजूदा तरीका फिलहाल जारी रहेगा। हालांकि, अदालत ने भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल और अनुभव-आधारित साक्ष्य सामने आने पर इस व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा की संभावना खुली रखी है। साथ ही केंद्र सरकार को वैकल्पिक तरीकों की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की स्वतंत्रता भी दी गई है।(Amar Bharti)

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