भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौता: 2014 की डील से खुला रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय

भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौता: भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम बना रणनीतिक जरूरत

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम सहयोग समझौता
भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम सहयोग से ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी को मिली नई मजबूती।

भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौता दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है। वर्षों तक ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम निर्यात करने से इनकार करता रहा, लेकिन 2014 में हुए असैन्य परमाणु सहयोग समझौते (Civil Nuclear Cooperation Agreement) के बाद यह रास्ता खुल गया। आज यह समझौता केवल परमाणु ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी और क्वाड जैसे मंचों पर दोनों देशों के सहयोग को भी नई मजबूती प्रदान करता है।

सौजन्य: सोशल मीडिया: भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंध

ऑस्ट्रेलिया क्यों है दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार वाला देश?

भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौते की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया दुनिया के ज्ञात रिकवरेबल (Recoverable) यूरेनियम भंडार का लगभग 28 से 30 प्रतिशत हिस्सा रखता है। यह किसी भी अन्य देश से अधिक है। दक्षिण ऑस्ट्रेलिया का ओलंपिक डैम, नॉर्दर्न टेरिटरी की रेंजर और जाबिलुका खदानें तथा पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की कई खदानें विश्व के प्रमुख यूरेनियम स्रोतों में शामिल हैं। यही कारण है कि ऑस्ट्रेलिया वैश्विक परमाणु ईंधन आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

क्यों नहीं हो पाया था पहले समझौता?

भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौते का रास्ता आसान नहीं था। 1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षण ‘पोखरण-1’ के बाद ऑस्ट्रेलिया सहित कई पश्चिमी देशों ने भारत को परमाणु सामग्री उपलब्ध कराने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। इसके बाद 1978 में ऑस्ट्रेलिया ने नीति बनाई कि केवल परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को ही यूरेनियम बेचा जाएगा। भारत ने इस संधि को भेदभावपूर्ण बताते हुए इस पर हस्ताक्षर नहीं किए। 1998 के पोखरण-2 परीक्षण के बाद भी दोनों देशों के बीच यह गतिरोध बना रहा।

2008 से 2014 तक कैसे बदले हालात?

भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते और 2008 में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) से भारत को मिली विशेष छूट के बाद वैश्विक परिस्थितियां बदलने लगीं। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया की लेबर सरकार लंबे समय तक भारत को यूरेनियम बेचने के पक्ष में नहीं थी। वर्ष 2011 में ऑस्ट्रेलियन लेबर पार्टी ने अपनी नीति में बदलाव किया और अंततः 2014 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी एबॉट के बीच असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसी समझौते ने भारत के लिए ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम का रास्ता खोल दिया। ऐसे में यह माना जा रहा है कि भारत-ऑस्ट्रेलिया के संबंध आने वाले समय में और मज़बूत हो सकते हैं।

सौजन्य: सोशल मीडिया: भारत ऑस्ट्रेलिया संबंध

ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम क्यों माना जाता है सबसे भरोसेमंद?

भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौते की सफलता का एक बड़ा कारण ऑस्ट्रेलिया की विश्वसनीयता भी है। वहां का राजनीतिक माहौल स्थिर है, लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत है और वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार नियमों का पालन करता है। कई अन्य यूरेनियम उत्पादक देशों में राजनीतिक अस्थिरता या सुरक्षा संबंधी चुनौतियां रहती हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया को सुरक्षित और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता माना जाता है। वहां मिलने वाला हाई-ग्रेड यूरेनियम कम अशुद्धियों वाला होता है, जिससे परमाणु ईंधन तैयार करना अपेक्षाकृत अधिक किफायती माना जाता है।

भारत-ऑस्टेलिया समझौता

भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की जरूरत क्यों?

भारत के पास अपने यूरेनियम भंडार हैं, लेकिन उनकी मात्रा सीमित है और अधिकांश भंडार कम गुणवत्ता वाले हैं। भारत के परमाणु ऊर्जा संयंत्र, विशेष रूप से प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर्स (PHWR), लगातार यूरेनियम आपूर्ति पर निर्भर हैं। भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौता इस आवश्यकता को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत का लक्ष्य आने वाले वर्षों में परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को 22 गीगावॉट और उससे अधिक तक पहुंचाना है। इसके लिए घरेलू उत्पादन पर्याप्त नहीं माना जाता।

ऊर्जा सुरक्षा और नेट-जीरो लक्ष्य में बड़ी भूमिका

भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। कोयले पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए परमाणु ऊर्जा को महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौते के तहत मिलने वाला ईंधन भारत के स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रम को मजबूती देता है। इससे बिजली उत्पादन की लागत नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है और भारत के नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

सौजन्य: सोशल मीडिया

रणनीतिक साझेदारी को भी मिला नया आयाम

यह समझौता केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा, समुद्री सुरक्षा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और क्वाड (QUAD) जैसे मंचों पर बढ़ती साझेदारी में भी इसकी अहम भूमिका मानी जाती है। दोनों लोकतांत्रिक देशों के बीच विश्वास बढ़ने से आर्थिक और सामरिक संबंध भी लगातार मजबूत हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यूरेनियम सहयोग दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक रिश्तों की मजबूत नींव बन चुका है।

भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के लिए क्यों जरूरी है यूरेनियम?

भारत लंबे समय से तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम पर काम कर रहा है, जिसका अंतिम लक्ष्य देश में उपलब्ध विशाल थोरियम भंडार के जरिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करना है। हालांकि इस कार्यक्रम के शुरुआती चरणों में यूरेनियम की आवश्यकता बनी रहेगी। ऐसे में भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौता भारत के दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को गति देने और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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भारत के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौता केवल एक व्यापारिक करार नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा नीति और रणनीतिक विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आने वाले वर्षों में भारत में परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के साथ ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की भूमिका और बढ़ सकती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान भी ऊर्जा सहयोग दोनों देशों के एजेंडे में प्रमुखता से शामिल रहा। (Amar Bharti)

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