Election Commission में मतभेदों का इतिहास पुराना है। 1990 से 2024 तक टीएन शेषन, गोपालस्वामी, अशोक लावासा और अरुण गोयल से जुड़े प्रसंग सामने आए।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत का Election Commission लंबे समय से बहुसदस्यीय संस्था के रूप में काम करता रहा है, लेकिन इसके भीतर मतभेदों का इतिहास भी पुराना है। फाइल में 1990 के दशक से लेकर 2024 तक ऐसे कई प्रसंगों का उल्लेख है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच निर्णयों या प्रक्रियाओं को लेकर मतभेद सामने आए।
1990 में फिर एक सदस्यीय हुआ आयोग
फाइल के मुताबिक 1989 में Election Commission के मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की गई थी। एसएस धनओआ और वीएस सहगल को मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरी शास्त्री के कार्यकाल में चुनाव आयुक्त बनाया गया।
हालांकि जनवरी 1990 तक व्यवस्था फिर एक सदस्यीय हो गई। इसके बाद 1993 में टीएन शेषन के कार्यकाल में एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति चुनाव आयुक्त बने और आयोग के भीतर अधिकारों को लेकर मतभेद सामने आए।
सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में स्थिति स्पष्ट की
फाइल में बताया गया है कि 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने Election Commission के मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के दर्जे और शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की। इसके अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त समान दर्जे और शक्तियों के साथ काम करते हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त को ‘फर्स्ट अमंग इक्वल्स’ यानी समान लोगों में प्रथम माना गया।
गोपालस्वामी और नवीन चावला के बीच मतभेद
2006 से 2009 के बीच एन गोपालस्वामी और नवीन चावला के कार्यकाल में भी आयोग के भीतर मतभेद चर्चा में रहे। फाइल के अनुसार गोपालस्वामी ने चावला को हटाने की सिफारिश की थी और उन पर कांग्रेस के प्रति पक्षपात के आरोप लगाए थे। इसके अलावा बैठक की सूचनाएं लीक किए जाने का आरोप भी लगाया गया था। केंद्र सरकार ने यह सिफारिश स्वीकार नहीं की।
2019 में लावासा की असहमति

2019 में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के कार्यकाल में चुनाव आयुक्त अशोक लावासा की ओर से आदर्श आचार संहिता से जुड़े कुछ मामलों में अलग राय सामने आई। फाइल में इन मामलों का संबंध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से जुड़ी शिकायतों से बताया गया है।
उस समय Election Commission की ओर से यह कहा गया था कि असहमति संबंधी नोट क्वासी-ज्यूडिशियल आदेशों में ही सार्वजनिक होते हैं। बाद में अशोक लावासा ने अगस्त 2020 में इस्तीफा दे दिया।
2024 में अरुण गोयल का इस्तीफा
फाइल के अनुसार अरुण गोयल ने मार्च 2024 में इस्तीफा दिया था और इस्तीफे के लिए व्यक्तिगत कारण बताए गए थे। उनके कार्यकाल और आयोग के साथ संबंधों को लेकर अलग-अलग तरह की अटकलें सामने आई थीं।
Election Commission के इतिहास में इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि बहुसदस्यीय व्यवस्था में अलग-अलग राय सामने आना कोई नया घटनाक्रम नहीं है। हालांकि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग रही हैं और किसी भी विवाद का आकलन उसके समय, दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना चाहिए। (AMAR BHARTI)
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