G7 में चीन की गैरमौजूदगी पर फिर उठे सवाल, क्या दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को अब मिलनी चाहिए जगह?

G7 शिखर सम्मेलन में चीन शामिल क्यों नहीं है? जानिए दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को G7 से बाहर रखने के राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक कारण।

G7 शिखर सम्मेलन में चीन की गैरमौजूदगी पर उठते सवाल
G7 देशों की बैठक में चीन को शामिल करने की मांग और विरोध दोनों जारी हैं।

नई दिल्ली/अमर भारती। फ्रांस में दुनिया की सात प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह G7 (ग्रुप ऑफ सेवन) का शिखर सम्मेलन शुरू हो चुका है। इस बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत कई बड़े वैश्विक नेता हिस्सा ले रहे हैं। हालांकि, हर बार की तरह इस बार भी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन इस मंच का हिस्सा नहीं है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एक बार फिर सवाल उठा रहे हैं कि क्या बदलती वैश्विक परिस्थितियों में चीन को G7 से बाहर रखना उचित है?

1975 में क्यों नहीं था चीन शामिल?

G7 की शुरुआत वर्ष 1975 में आर्थिक संकट और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के उद्देश्य से हुई थी। उस समय इस समूह में अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली और जापान शामिल थे। अगले वर्ष कनाडा के जुड़ने के बाद यह G7 बन गया।

उस दौर में चीन आर्थिक रूप से कमजोर था और सांस्कृतिक क्रांति के प्रभाव से आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रहा था। इसके अलावा, शीत युद्ध के दौर की राजनीतिक परिस्थितियों और पश्चिमी देशों के साथ तनावपूर्ण संबंधों के कारण भी चीन को इस मंच में शामिल नहीं किया गया।

आज का चीन बदल चुका है वैश्विक शक्ति संतुलन

विशेषज्ञों का मानना है कि 1975 का चीन और आज का चीन पूरी तरह अलग हैं। बीते पांच दशकों में चीन ने आर्थिक, तकनीकी और सैन्य क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। आज चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसका वैश्विक व्यापार, निवेश तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं पर व्यापक प्रभाव है।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो चीन की अर्थव्यवस्था G7 के कई सदस्य देशों जैसे जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा से बड़ी है। केवल अमेरिका ही उससे आगे है। ऐसे में कई विश्लेषकों का तर्क है कि वैश्विक आर्थिक नीतियों पर चर्चा करने वाले मंच में चीन की अनुपस्थिति इसकी प्रभावशीलता को सीमित करती है।

जलवायु और वैश्विक सुरक्षा में भी अहम भूमिका

चीन दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक देशों में शामिल है और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक व्यापार जैसे मुद्दों पर चीन की भूमिका निर्णायक मानी जाती है।

इसके अलावा, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव और उसकी सैन्य क्षमता भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन के बिना वैश्विक चुनौतियों का स्थायी समाधान निकालना मुश्किल है।

फिर भी G7 में चीन की एंट्री क्यों नहीं?

चीन को G7 में शामिल न किए जाने के पीछे कई राजनीतिक और वैचारिक कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था का मुद्दा है। G7 के सभी सदस्य देश लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का पालन करते हैं, जबकि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली एकदलीय व्यवस्था है।

इसके अलावा, रूस, ईरान और कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चीन का रुख अक्सर G7 देशों से अलग रहता है। जहां पश्चिमी देश रूस और ईरान पर प्रतिबंधों का समर्थन करते हैं, वहीं चीन कई मामलों में इन देशों के साथ खड़ा दिखाई देता है।

समूह की एकजुटता पर भी चिंता

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन को शामिल करने से G7 की मौजूदा एकजुटता प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि चीन की आर्थिक ताकत और रणनीतिक प्रभाव समूह के भीतर नए मतभेद पैदा कर सकते हैं, जिससे G7 के साझा एजेंडे पर असर पड़ सकता है।

रूस का अनुभव भी बना बड़ी वजह

G7 देशों की सतर्कता के पीछे रूस का अनुभव भी अहम माना जाता है। वर्ष 1998 में रूस को शामिल कर G8 बनाया गया था, लेकिन 2014 में क्रीमिया विवाद के बाद रूस को समूह से बाहर कर दिया गया। इसके बाद से सदस्य देशों ने नए देशों को शामिल करने के मुद्दे पर अधिक सावधानी बरतनी शुरू कर दी।

चीन का बदला हुआ रुख

पहले चीन अक्सर G7 को शीत युद्ध की सोच का प्रतीक बताता था, लेकिन हाल के वर्षों में उसका रुख कुछ नरम दिखाई दिया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वैश्विक मंचों को टकराव और विभाजन बढ़ाने के बजाय सहयोग, संवाद और साझेदारी को बढ़ावा देना चाहिए।

क्या भविष्य में बदल सकता है समीकरण?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव की मौजूदा रफ्तार जारी रहती है, तो भविष्य में G7 की संरचना और सदस्यता को लेकर बहस और तेज हो सकती है। फिलहाल चीन इस समूह का सदस्य नहीं है, लेकिन वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका इतनी बड़ी हो चुकी है कि उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

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